Friday, March 12, 2021

शिवपुराण में बताए हैं उम्र और धन बढ़ाने वाले ये सरल उपाय

 

शिवपुराण में बताए हैं उम्र और धन बढ़ाने वाले ये सरल उपाय :-


इस सृष्टि की रचना शिवजी की इच्छा मात्र से ही हुई है। शिवपुराण में बताया गया है कि ब्रह्माजी ने शिवजी की इच्छा के अनुसार संपूर्ण सृष्टि रची है। महादेव ने इसके संचालन का कार्य भगवान श्रीहरि को सौंपा है। इसी कारण शिवजी का पूजन सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाले माना गया है। जो भी व्यक्ति भोलेनाथ की आराधना करता है, उसे सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है। उसके पाप नष्ट हो जाते हैं, अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। यदि आप भी शिवजी की कृपा से स्वास्थ्य, उम्र और धन संबंधी परेशानियों से मुक्ति पाना चाहते हैं तो शिवपुराण में बताए गए उपाय करना चाहिए।

शिवपुराण में सप्ताह के सातों दिनों के लिए अलग-अलग देवताओं के पूजन का महत्व बताया गया है। रविवार को सूर्य, सोमवार को चंद्र, मंगलवार को मंगल, बुधवार को बुध, गुरुवार को बृहस्पति, शुक्रवार को शुक्र और शनिवार को शनि का पूजन करना श्रेष्ठ है।

सूर्य आरोग्य देता है। 

चंद्र धन-संपत्ति देता है। 

मंगल व्याधियों यानी रोगों का निवारण करता है। 

बुध देव बल देता है। 

बृहस्पति आयु बढ़ाता है। 

शुक्र भौतिक सुख प्रदान करता है। 

शनि मृत्यु का भय दूर करता है।

रविवार को ऐसे प्राप्त करें सूर्य की कृपा

सूर्य की कृपा पाने के लिए हर रोज सूर्य को जल अर्पित करना चाहिए। रविवार को तांबे के लोटे में जल भरें, पुष्प डालें और सूर्य को अर्पित करें। इसके बाद किसी जरुरतमंद व्यक्ति को या किसी ब्राह्मण को भोजन कराएं। यदि भोजन नहीं करा सकते हैं तो किसी मंदिर में अन्न का दान करें। यह उपाय नियमित रूप से करते रहेंगे तो सूर्य की कृपा से आरोग्य की प्राप्ति होती है। रोगों से मुक्ति मिलती है और यौवन बना रहता है।

सोमवार को ऐसे प्राप्त करें चंद्र की पूजा

चंद्र देव की कृपा से व्यक्ति को धन-संपत्ति के साथ ही मानसिक शांति की प्राप्ति भी होती है। चंद्र कृपा पाने के लिए हर सोमवार देवी लक्ष्मी का पूजन करें। पूजन के बाद किसी जरुरतमंद व्यक्ति को या किसी ब्राह्मण को घी से निर्मित भोजन कराएं या किसी मंदिर में घी का दान करें।

इस उपाय से धन संबंधी कार्यों में रही बाधाएं दूर होती हैं और देवी लक्ष्मी की कृपा से घर में बरकत बनी रहती है।

मंगलवार को ऐसे प्राप्त करें मंगल की कृपा

मंगल की कृपा पाने के लिए हर मंगलवार मां काली का पूजन करना चाहिए। इसके साथ ही उड़द, मूंग एवं अरहर की दाल से निर्मित भोजन किसी ब्राह्मण को या किसी जरुरतमंद व्यक्ति को कराएं। इस उपाय को नियमित रूप से करने पर मंगल की कृपा प्राप्त होती है और रोगों की शांति होती है। स्वास्थ्य उत्तम रहता है। भूमि संबंधी कार्यों में भी शुभ फल प्राप्त होते हैं।

बुधवार को ऐसे प्राप्त करें बुध की कृपा

यदि आप बुध की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं तो हर बुधवार यह उपाय करें। उपाय के अनुसार हर बुधवार भगवान विष्णु का पूजन करें। पूजन में दधियुक्त यानी दूध-दही से निर्मित प्रसाद अर्पित करें। मिठाई अर्पित की जा सकती है। यह उपाय नियमित रूप से करते रहना चाहिए। इसके शुभ प्रभाव से पुत्र, मित्र और घर-परिवार से सहयोग प्राप्त होता है। दुख दूर होते हैं। सुखद वातावरण बना रहता है।

गुरुवार को ऐसे प्राप्त करें बृहस्पति की कृपा

जो लोग गुरुवार को यहां बताया जा रहा उपाय नियमित रूप से करते हैं, उन्हें लंबी आयु प्राप्त हो सकती है। देव गुरु बृहस्पति से कृपा पाने के लिए हर गुरुवार वस्त्र, यज्ञोपवित और घी मिश्रित खीर से शिवजी का पूजन करना चाहिए। शिवपुराण के अनुसार इस उपाय से व्यक्ति दीर्घायु होता है।

शुक्रवार को ऐसे प्राप्त करें शुक्र की कृपा

समस्त भोग यानी सभी भौतिक सुख-सुविधाएं प्राप्त करने के लिए शुक्रवार को यह उपाय करें। उपाय के अनुसार हर शुक्रवार शिवजी को तांबे के लोटे में जल भरकर अर्पित करें। बिल्व पत्र चढ़ाएं। किसी ब्राह्मण या जरुरतमंद व्यक्ति को अन्न का दान करें। यह उपाय नियमित रूप से करते रहने पर व्यक्ति को समस्त भोगों की प्राप्ति होती है। पत्नी से सुख पाने के लिए शुक्रवार को पत्नी को सुंदर वस्त्र का उपहार दें।

शनिवार को ऐसे प्राप्त करें शनि की कृपा

शनि की कृपा से मृत्यु भय से मुक्ति पाने के लिए हर शनिवार भगवान शिव का विशेष पूजन करना चाहिए। पूजन में जल, बिल्व पत्र, काले तिल आदि अर्पित करें। किसी जरुरतमंद व्यक्ति को या किसी ब्राह्मण को तिल मिश्रित भोजन कराएं। शनि के निमित्त तेल का दान करें। हनुमान चालीसा का पाठ करें। जो लोग यहां बताए गए उपाय नियमित रूप से करते रहते हैं, उन्हें आयोग्य प्राप्त होता है।

Thursday, March 4, 2021

कुण्डली के अशुभ योगों की शान्ति





*कुण्डली के अशुभ योगों की शान्ति*

1).चांडाल योग=गुरु के साथ राहु या केतु हो तो जातकको चांडाल दोष है

2).सूर्य ग्रहण योग=सूर्य के साथ राहु या केतु हो तो

3). चंद्र ग्रहण योग=चंद्र के साथ राहु या केतु हो तो

4).श्रापित योग -शनि के साथ राहु हो तो दरिद्री योग होता है

5).पितृदोष- यदि जातक को 2,5,9 भाव में राहु केतु या शनि है तो जातक पितृदोष से पीड़ित है.

6).नागदोष - यदि जातक को 5 भाव में राहु बिराजमान है तो जातक पितृदोष के साथ साथ नागदोष भी है.

7).ज्वलन योग- सूर्य के साथ मंगल की युति हो तो जातक ज्वलन योग(अंगारक योग) से पीड़ित होता है

8).अंगारक योग- मंगल के साथ राहु या केतु बिराजमान हो तो जातक अंगारक योग से पीड़ित होता है.

9).सूर्य के साथ चंद्र हो तो जातक अमावस्या का जना है

10).शनि के साथ बुध = प्रेत दोष.

11).शनि के साथ केतु = पिशाच योग.

12).केमद्रुम योग- चंद्र के साथ कोई ग्रह ना हो एवम् आगे पीछे के भाव में भी कोई ग्रह न हो तथा किसी भी ग्रह की दृष्टि चंद्र पर ना हो तब वह जातक केमद्रुम योग से पीड़ित होता है तथा जीवन में बोहोत ज्यादा परिश्रम अकेले ही करना पड़ता है.

13).शनि + चंद्र=विषयोग शान्ति करें

14).एक नक्षत्र जनन शान्ति -घर के किसी दो व्यक्तियों का एक ही नक्षत्र हो तो उसकी शान्ति करें.

15).त्रिक प्रसव शान्ति- तीन लड़की के बाद लड़का या तीन लड़कों के बाद लड़की का जनम हो तो वह जातक सभी पर भारी होता है

16).कुम्भ विवाह= लड़की के विवाह में अड़चन या वैधव्य योग दूर करने हेतु.

17).अर्क विवाह = लड़के के विवाह में अड़चन या वैधव्य योग दूर करने हेतु.

18).अमावस जन्म- अमावस के जनम के सिवा कृष्ण चतुर्दशी या प्रतिपदा युक्त अमावस्या जन्म हो तो भी शान्ति करें

19).यमल जनन शान्ति=जुड़वा बच्चों की शान्ति करें.

20).पंचांग के 27 योगों में से 9
"अशुभ योग"

1.विष्कुंभ योग.
2.अतिगंड योग.
3.शुल योग.
4.गंड योग.
5.व्याघात योग.
6.वज्र योग.
7.व्यतीपात योग.
8.परिघ योग.
9.वैधृती योग.

21).पंचांग के 11 करणों में से 5
"अशुभ करण"

1.विष्टी करण.
2.किंस्तुघ्न करण.
3.नाग करण.
4.चतुष्पाद करण.
5.शकुनी करण.

*जानिये नक्षत्र जिनकी शान्ति करना जरुरी है*

1).अश्विनी का- पहला चरण.(1).अशुभ है.

2).भरणी का - तिसरा चरण.(3).अशुभ है.

3).कृतीका का - तीसरा चरण.(3).अशुभ है.

4).रोहीणी का - पहला,दूसरा और तीसरा चरण.(1,2,3).अशुभ है.

5).आर्द्रा का - चौथा चरण.(4).अशुभ है.

6).पुष्य नक्षत्र का - दूसरा और तीसरा चरण.(2,3).अशुभ है.

7).आश्लेषा के-चारों चरण(1,2,3,4).अशुभ है

8).मघा का- पहला और तीसरा
चरण.(1,3).अशुभ है.

9).पूर्वाफाल्गुनी का-चौथा चरण(4).अशुभ है

10).उत्तराफाल्गुनी का- पहला और चौथा चरण.(1,4).अशुभ है

11).हस्त का- तीसरा चरण.(3).अशुभ है.

12).चित्रा के-चारों चरण.(1,2,3,4).अशुभ है

13).विशाखा के -चारों चरण.(1,2,3,4).अशुभ है.

14).ज्येष्ठा के -चारों चरण(1,2,3,4)अशुभ है

15).मूल के -चारों चरण.(1,2,3,4).अशुभ है.

16).पूर्वषाढा का- तीसरा चरण.(3).अशुभ है.

17).पूर्वभाद्रपदा का-चौथा चरण(4)अशुभ है

18).रेवती का - चौथा चरण.(4).अशुभ है.

यह शांती विधान हर 3 वर्ष बाद जरुर करालेना चाहीए क्योंकि ग्रह नक्षत्र योगका दोष हमे पीछले जन्मोके श्रापके कारण लगता है और श्रापमेसे कभीभी मुक्ती नही मीलती बलकी श्रापके खराब असरको बहोत हद तक तीन सालके लीये कम कीया जाता है विवरण

1 प्रतिपदा तिथि- यह वृद्धि और सिद्धप्रद तिथि है। स्वामी अग्नि देवता, नन्दा नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में अशुभ, कृष्ण पक्ष में शुभ। इस तिथि में कूष्माण्ड दान एवं भक्षण त्याज्य है।

2 द्वितीया- यह सुमंगला और कार्य सिद्धिकारी तिथि है। इसके स्वामी ब्रह्मा हैं। भद्रा नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में अशुभ, कृष्ण पक्ष में शुभ । इस तिथि में कटेरी फल का दान और भक्षण त्याज्य है।

3 तृतीया तिथि- यह सबला और आरोग्यकारी तिथि है। इसकी स्वामी गौरी जी हैं। जया नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में अशुभ, कृष्ण पक्ष में शुभ । इस तिथि में नमक का दान व भक्षण त्याज्य है।

4 चतुर्थी तिथि- यह खल और हानिप्रद तिथि है। इसके स्वामी गणेश जी हैं। रिक्ता नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में अशुभ, कृष्ण पक्ष में शुभ । इस तिथि में तिल का दान और भक्षण त्याज्य है।

5 पंचमी तिथि- यह धनप्रद व शुभ तिथि है। इसके स्वामी नागराज वासुकी हैं। पूर्णा नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में अशुभ और कृष्ण पक्ष में शुभ । इस तिथि में खट्टी वस्तुओं का दान और भक्षण त्याज्य है।

6 षष्ठी तिथि- कीर्तिप्रद तिथि है। इसके स्वामी स्कंद भगवान हैं। नन्दा नाम से ख्याति, शुक्ल व कृष्ण पक्ष में मध्यम फलदायी, तैल कर्म त्याज्य।

7 सप्तमी तिथि- मित्रप्रद व शुभ तिथि है। इसके स्वामी भगवान सूर्य हैं। भद्रा नाम से ख्याति, शुक्ल व कृष्ण दोनों पक्षों में मध्यम, आंवला त्याज्य।

8 अष्टमी तिथि- बलवती व व्याधि नाशक तिथि है। इसके देवता शिव जी हैं। जया नाम से ख्याति, शुक्ल व कृष्ण दोनों पक्षों में मध्यम, नारियल त्याज्य।

9 नवमी तिथि- उग्र व कष्टकारी तिथि है। इसकी देवता दुर्गा जी हैं। रिक्ता नाम से ख्याति, शुक्ल व कृष्ण दोनों पक्षों में मध्यम, काशीफल (कोहड़ा, कद्दू) त्याज्य।

10 दशमी तिथि- धर्मिणी और धनदायक तिथि है। इसके देवता यम हैं। पूर्णा नाम से ख्याति, शुक्ल व कृष्ण दोनों पक्षों में मध्यम, त्याज्य कर्म परवल है।

11 एकादशी तिथि- आनंद प्रदायिनी और शुभ फलदायी तिथि है। इसके देवता विश्व देव हैं। नन्दा नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में शुभ, कृष्ण पक्ष में अशुभ, त्याज्य कर्म दाल है।

12 द्वादशी तिथि- यह यशोबली और सर्वसिद्धिकारी तिथि है। इसके देवता हरि हैं। भद्रा नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में शुभ, कृष्ण पक्ष में अशुभ, त्याज्य कर्म मसूर है।

13 त्रयोदशी तिथि- यह जयकारी और सर्वसिद्धिकारी तिथि है। इसके देवता मदन (कामदेव) हैं। जया नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में शुभ, कृष्ण पक्ष में अशुभ, त्याज्य कर्म बैंगन है।

14 चतुर्दशी तिथि- क्रूरा और उग्रा तिथि है। इसके देवता शिवजी हैं। रिक्ता नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में शुभ, कृष्ण पक्ष में अशुभ, त्याज्य कर्म मधु है।

15 पूर्णिमा तिथि- यह सौम्य और पुष्टिदा तिथि है। इसके देवता चंद्रमा हैं। पूर्णा नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में पूर्ण शुभ, त्याज्य कर्म घृत है।

30 अमावस्या तिथि- पीड़ाकारक और अशुभ तिथि है। इसके स्वामी पितृगण हैं। फल अशुभ है, त्याज्य कर्म मैथुन है।

विभिन्न नक्षत्रों के योग में भिन्न-भिन्न वस्तुओं के दान का माहात्म्य

महाभारत अनुशासन पर्व के दानधर्म पर्व के अंतर्गत अध्याय 64 में विभिन्न नक्षत्रों के योग में भिन्न-भिन्न वस्तुओं के दान का माहात्म्य का वर्णन हुआ है


युधिष्ठिर का संशय

वैशम्पायन जी कहते हैं- जनमेजय! युधिष्ठिर ने पूछा- पितामह। मैंने आपका उपदेश सुना। अन्नदान का जो विधान है, वह ज्ञात हुआ। अब मुझे यह बताइये कि किस नक्षत्र का योग प्राप्त होने पर किस-किस वस्तु का दान करना उत्तम है।

भीष्म द्वारा नक्षत्रों के योग में भिन्न-भिन्न वस्तुओं के दान का माहात्म्य


भीष्म जी ने कहा- युधिष्ठिर। इस विषय में जानकार मनुष्य देवकी देवी और महर्षि नारद के संवाद रूप प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं। एक समय की बात है, धर्मदर्शी देवर्षि नारद जी द्वारका में आये थे। उस समय वहाँ देवकी देवी ने उनके सामने यही प्रश्‍न उपस्थित किया।  प्रजानाथ। देवकी के इस प्रकार पूछने पर देवर्षि नारद ने उस समय विधि पूर्वक सब बातें बतायीं। वे ही बातें मैं तुमसे कहता हूँ सुनो।नारद जी ने कहा- महाभागे।

कृत्तिका नक्षत्र आने पर मनुष्य घृतयुक्त खीरे के द्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मणों को तृप्त करे। इससे वह सर्वोत्तम लोकों को प्राप्त होता है।

रोहिणी नक्षत्र में पके हुए फल के गूदे, अन्न, घी, दूध तथा पीने योग्य पदार्थ ब्राह्मण को दान करने चाहिये। इससे उनके ऋण से छुटकारा मिलता है।

मृगशिरा नक्षत्र में दूध देने वाली गौ का बछड़े सहित दान करके दाता मृत्यु के पश्चात इस लोक से सर्वोत्तम स्वर्ग लोक में जाते हैं।

आद्रा नक्षत्र में उपवास पूर्वक तिल मिश्रित खिचड़ी दान करने वाला मनुष्य बड़े-बड़े दुर्गम संकटों से तथा क्षुरकी-सी धार वाले पर्वतों से भी पार हो जाता है।

पुनर्वसु नक्षत्र में पूजा और अन्न-दान करके मनुष्य उत्तम कुल में जन्म लेता है तथा वहाँ यशस्वी, रूपवान एवं प्रचुर अन्न से सम्पन्न होता है।

पुष्य नक्षत्र में सोने का आभूषण अथवा केवल सोना ही दान करने से दाता प्रकाश शून्य लोकों में भी चन्द्रमा के समान प्रकाशित होता है।

जो आश्‍लेषा नक्षत्र में चांदी अथवा बैल दान करता है वह इस जन्म में सब प्रकार के भय से मुक्त हो दूसरे जन्म उत्तम कुल में जन्म लेता है।

जो मनुष्य मघा नक्षत्र में तिल से भरे हुए वर्धमान पात्रों का दान करता है वह इहलोक में पुत्रों और पशुओं से सम्पन्न हो परलोक में भी आनन्द का भागी होता है।

पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में उपवास करके जो मनुष्य ब्राह्मणों को मक्खन मिश्रित भक्ष पदार्थ देतो है, वह सौभाग्यशाली होता है।

उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में विधि पूर्वक घृत और दुग्ध से युक्त साठी के चावल के भात का दान करने से मनुष्य स्वर्गलोक में सम्मानित होता है।

उत्तरा नक्षत्र में मनुष्य जो-जो दान देते हैं, वह महान फल से युक्त एवं अनन्त होता है- यह शास्त्रों का निश्‍चय है।

हस्थ नक्षत्र में उपवास करके ध्वजा, पताका, चंदोवा और किंकिणीजाल- इन चार वस्तुओं से युक्त हाथी जुते हुए रथ का दान करने वाला मनुष्य पवित्र कामनाओं से युक्त उत्तम लोकों में जाता है।

भारत। जो लोग चित्रा नक्षत्र में वृषभ एवं पवित्र गंध का दान करते हैं वे अप्सराओं के लोक में विचरते और नंद वन में रमण करते हैं।

स्वाती नक्षत्र में अपनी अधिक-से-अधिक प्रिय वस्तु का दान करके मनुष्य शुभ लोकों में जाता है और इस जगत में भी महान यश का भागी होता है।

जो विशाखा नक्षत्र में गाड़ी ढाने वाले बैल, दूध देने वाली गाय, धान्य, वस्त्र और प्रासंग सहित सकट दान करत है, वह देवता और पितरों को तृप्त कर देता है तथ मृत्यु के पश्चात अक्षय सुख का भागी होता है। वह जीते जी कभी संकट में नहीं पड़ता और मरने के बाद स्वर्गलोक में जाता है।

पूर्वोक्त वस्तुओं का ब्राह्मणों का दान करके मनुष्य इच्छित जीविका-वृत्ति पा लेता है और नकर आदि के कष्ट भी कभी नहीं भोगता ऐसा शास्त्रों का निश्‍चय है।

जो मनुष्य अनुराधा नक्षत्र में उपवास करके ओढने का वस्त्र और उत्तम अन्न दान करता है, वह सौ युगों तक स्वर्गलोक में सम्मान पूर्वक रहता है।

जो मनुष्य ज्येष्ठा नक्षत्र में ब्राह्मणों को समयोचित शाक और मूली दान करता है, वह अभीष्ट समृद्धि और सदगति को प्राप्त होता है।

मूल नक्षत्र में एकाग्रचित्त हो ब्राह्मणों को मूल-फल दान करने वाला मनुष्य पितरों को तृप्त करता और अभीष्ट गति को पाता है।

पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में उपवास करके कुलीन, सदाचारी एवं वेदों के पारंगत विद्वान ब्राह्मण को दही से भरे हुए पात्र का दान करने वाला मनुष्य मृत्यु के पश्चात ऐसे कुल में जन्म लेता है, जहाँ गौधन की अधिकता होती है।

जो उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में जलपूर्ण कलष सहित सत्तू की बनी हुई खाद्य वस्तु, घी और प्रचुर माखन दान करता है, वह सम्पूर्ण मनोवांछित भोगों को प्राप्त कर लेता है।

जो नित्य धर्मपरायण पुरुष अभिजिल नक्षत्र के योग में मनीषी ब्राह्मणों को मधु और घी से युक्त दूध देता है, वह स्वर्गलोक में सम्मानित होता है।

जो श्रवण नक्षत्र में वस्त्रवेष्टित कम्बल दान करता है, वह स्वेत विमान के द्वारा खुले हुए स्वर्गलोक में जाता है।

जो धनिष्टा नक्षत्र में एकाग्रचित्त होकर बैलगाड़ी, वस्त्र-समूह तथा धन दान करता है, वह मृत्यु के पश्चात शीघ्र ही राज्य पाता है।

जो शतभिषा नक्षत्र के योग में अगुरु और चन्दन के सहित सुगन्धित पदार्थों का दान करता है वह परलोक में अप्सराओं के समुदाय तथा अक्षय गंध को पाता है।

पूर्वाभाद्रपदा नक्षत्र के योग में बड़ी उड़द या सफेद मटर का दान करके मनुष्य परलोक में सब प्रकार की खाद्य वस्तुओं से सम्पन्न हो सुखी होता है।

जो उत्तरा भाद्रपदा नक्षत्र के योग में औरभ्र फल का गूदा दान करता है वह पितरों को तृप्त करता और परलोक में अक्षय सुख का भागी होता है।

जो रेवती नक्षत्र में कांस के दुग्ध पात्र से युक्त धेनू का दान करता है वह धेनू परलोक में सम्पूर्ण भोगों को लेकर उस दाता की सेवा में उपस्थित होती है।

जो नरेश्रेष्ठ अष्विनि नक्षत्र में घोड़े जुते हुए रथ का दान करता है वह हाथी, घोड़े और रथ से सम्पन्न कुल में तेजस्वी पुत्र रूप से जन्म लेता है।

जो भरनी नक्षत्र में ब्राह्मणों को तिलमयी धेनू का दान करता है, वह इस लोक में बहुत सी गौओं का तथा परलोक में महान यश को प्राप्त करता है।

भीष्म जी कहते हैं- राजन। इस प्रकार नक्षत्रों के योग में किये जाने वाले विविध वस्तुओं के दान का संक्षेप से यहाँ वर्णन किया गया है। नारद जी ने देवकी से और देवकी जी ने अपनी पुत्रबधुओं से यह विषय सुनाया था।



कार्तिक मास 2021

  हिंदू धर्म में हर महीने का अलग-अलग महत्व होता है। लेकिन कार्तिक मास की महिमा बेहद खास मानी जाती है। हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास आठ...