Wednesday, October 30, 2019

शनि के बुरे प्रभाव से बचा सकते हैं ये उपाय

कुंडली में जब शनि अशुभ स्थिति में हो तो समझ लीजिए की बुरा वक्त शुरू हो गया है। शनि के प्रभाव में आए

जातकों का शनि फौरन न्याय करता है। ऐसे जातकों के सभी अच्छे-बुरे कर्मों का फैसला शनि फौरन करता है और उन्हें उचित फल देता है। अनिष्ट शनि ग्रह के प्रभाव से बचने के लिए कुछ खास उपाय कर इसके प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

शनि की बुरी दशा को खत्म करने के लिए आप चावल, तिल, उड़द, लोहा, तेल, काले वस्त्र, गुड, खाना, रोटी, तिल लड्डू, काला चना, लोहे का पात्र या उपकरण, आदि का दान कर सकते हैं. यह दान किसी गरीब या जरूरतमंद को ही करना लाभदायक होता है I

शनि दशा सही करने के लिए गरीबों की सेवा करें. गाय और कुत्ते को रोटी खिलाएं. चींटी को आंटा और शक्कर खिलने से भी लाभ मिलता है I

संध्या के समय हनुमान चालीसा का पाठ करें और पवनपुत्र को बेसन के लड्डू का भोग अवश्य लगाएं। इसके साथ ही काली हाय की सेवा करें और हर शनिवार को गौ माता के मस्तर पर रोली लगाकर सींगों में कलावा बांध कर धूप करें। इसके बाद परिक्रमा करके गाय को बूंदी के चार लड्डू खिलाएं I

भगवान हनुमान की पूजा करें। सूर्यास्त से पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं। इस दिन बंदरों को केला, गुड़ और काले चने खिलाए। ऐसा करने से शनि देव प्रसन्न होंगे और जातक इसके बुरे प्रभाव से काफी हद तक बच सकेंगे।

शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या को दूर करने के लिए भोजन से पहले परोसी हुई थाली में से सभी चीजें थोड़ी-थोड़ी अलग निकाल दें और इसे कौओं को खिलाएं।

शनि के बुरे प्रभाव से बचने के लिए राई का तेल या तिल का तेल दान करें। शनि के खराब असर से जूझ रहे हैं तो सुरमें की जली लेकर जमीन में गाड़ दें। इतना ही नहीं रात को सोते समय दूघ न पिएं।

सप्तम स्थान में शनि हो तो मदिरा पान न करें अन्यथा आर्थिक और शारीरिक कमजोरी झेलनी पड़ेगी। इसके असर से बचने के लिए किसी जरूरतमंद को शनिवार वाले दिन काले तिल, तेल और काले कपड़े का दान करें।

Chhath Puja 2019 : नहाय-खाय के साथ छठ पर्व की शुरुआत 31 अक्टूबर 2019, गुरुवार से




- पहला दिन (नहाय-खाय) 31 अक्टूबर, गुरुवार

छठ पर्व बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को नहाय-खाय के साथ होती है। इस दिन व्रत रखने वाले स्नान कर और नये कपड़े पहनकर लौकी आदि से तैयार शाकाहारी भोजन लेते हैं।


- दूसरा दिन (खरना) एक नवंबर शुक्रवार

अगले दिन यानी पंचमी तिथि को व्रत रखा जाता है। इसे खरना (खाली पेट) कहा जाता है। इस दिन निर्जला उपवास रखा जाता है। शाम को चावल और गुड़ से खीर खाया जाता है। चावल का पिठ्ठा और घी लगी रोटी भी खाई प्रसाद के रूप में परिवार में वितरीत की जाती है।

-तीसरा दिन (सूर्य षष्ठी) दो नवंबर शनिवार

सूर्य षष्ठी पर सूर्य देव की विशेष पूजा की जाती है। इस दिन बांस की टोकरी में प्रसाद और फल सजाए जाते हैं। इस टोकरी सभी व्रती सूर्य को अर्घ्य देने के लिए तालाब, नदी या घाट आदि पर जाते हैं। स्नान कर डूबते सूर्य की अर्घ्य देकर आराधना की जाती है।

चौथा दिन (समापन) तीन नवंबर रविवार

कार्तिक शुक्ल पक्ष की सप्तमी को उगते सूर्य भगवान की पूजा कर अर्घ्य दिया जाता है। भगवान भास्कर से परिवार के मंगलकामना के लिए आशीवार्द मांगकर घाट पर प्रसाद बांट कर छठ पूजा संपन्न की जाती है।

Tuesday, October 29, 2019

श्रीहरि और तुलसी विवाह

तुलसी विवाह कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष में एकादशी के दिन किया जाता है। इसे देवउठनी या देवोत्थान एकादशी भी कहा जाता है। यह एक श्रेष्ठ मांगलिक और आध्यात्मिक पर्व है| हिन्दू मान्यता के अनुसार इस तिथि पर भगवान श्रीहरि विष्णु के साथ तुलसी जी का विवाह होता है, क्योंकि इस दिन भगवान नारायण चार माह की निद्रा के बाद जागते हैं| भगवान विष्णु को तुलसी बेहद प्रिय हैं| तुलसी का एक नाम वृंदा भी है| नारायण जब जागते हैं, तो सबसे पहली प्रार्थना हरिवल्लभा तुलसी की सुनते हैं| इसीलिए तुलसी विवाह को देव जागरण का पवित्र मुहूर्त माना जाता है|

श्रीहरि और तुलसी विवाह कथा

यह कथा पौराणिक काल से है| हिन्दू पुराणों के अनुसार जिसे हम तुसली नाम से जानते हैं| वे एक राक्षस कन्या थीं| जिनका नाम वृंदा था| राक्षस कुल में जन्मी वृंदा श्रीहरि विष्णु की परम भक्त थीं| वृंदा के वयस्क होते ही उनका विवाह जलंधर नामक पराक्रमी असुर से करा दिया गया| वृंदा भगवान विष्णु की परम भक्त होने के साथ ही एक पतिव्रता स्त्री थीं| जिसके चलते जलंधर अजेय हो गया| जलंधर को अपनी शक्तियों पर अभिमान हो गया और उसने स्वर्ग पर आक्रमण कर देव कन्याओं को अपने अधिकार में ले लिया| इससे क्रोधित होकर सभी देव भगवान श्रीहरि विष्णु की शरण में गए और जलंधर के आतंक का अंत करने की प्रार्थना करने लगे| परंतु जलंधर का अंत करने के लिए सबसे पहले उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग करना अनिवार्य था|

भगवान विष्णु ने अपनी माया से जलंधर का रूप धारण कर वृंदा के पतिव्रत धर्म को नष्ट कर दिया| जिसके कारण जलंधर की शक्ति क्षीण हो गई और वह युद्ध में मारा गया| जब वृंदा को श्रीहरि के छल का पता चला तो, उन्होंने भगवान विष्णु से कहा हे नाथ मैंने आजीवन आपकी आराधना की, आपने मेरे साथ ऐसा कृत्य कैसे किया? इस प्रश्न का कोई उत्तर श्रीहरि के पास नहीं था| वे शांत खड़े सुनते रहें| जब वृंदा को अपने प्रश्न का उत्तर नहीं मिला तो उन्होंने भगवान विष्णु से कहा कि आपने मेरे साथ एक पाषाण की तरह व्यवहार किया मैं आपको शाप देती हूँ कि आप पाषाण बन जाएँ| शाप से भगवान विष्णु पत्थर बन गए| सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा| देवताओं ने वृंदा से याचना की कि वे अपना शाप वापस ले लें| देवों की प्रार्थना को स्वीकार कर वृंदा ने अपना शाप वापस ले लिया| परन्तु भगवान विष्णु वृंदा के साथ हुए छल के कारण लज्जित थे, अतः वृंदा के शाप को स्वीकार करते हुए उन्होंने अपना एक रूप पत्थर में प्रविष्ट किया जो शालिग्राम कहलाया|

भगवान विष्णु को शाप मुक्त करने के बाद वृंदा जलंधर के साथ सती हो गई| वृंदा की राख से एक पौधा निकला| जिसे श्रीहरि विष्णु ने तुलसी नाम दिया और वरदान दिया कि तुलसी के बिना मैं किसी भी प्रसाद को ग्रहण नहीं करूँगा| मेरे शालिग्राम रूप से तुलसी का विवाह होगा और कालांतर में लोग इस तिथि को तुलसी विवाह के रूप में मनाएंगे| देवताओं ने वृंदा की मर्यादा और पवित्रता को बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप का विवाह तुलसी से कराया| इसी घटना के उपलक्ष्य में प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देव प्रबोधनी एकादशी के दिन तुलसी का विवाह शालिग्राम के साथ कराया जाता है|

मंगलाष्टक से करें तुलसी विवाह

तुलसी विवाह हिंदू रीति-रिवाज़ों के अनुसार संपन्न किया जाता है। जिसमें मंगलाष्टक के मंत्रों का उच्चारण भी किया जाता है। भगवान शालीग्राम व तुलसी के विवाह की घोषणा के पश्चात मंगलाष्टक मंत्र बोले जाते हैं। मान्यता है कि इन मंत्रों से सभी शुभ शक्तियां वातावरण को शुद्ध, मंगलमय व सकारात्मक बनाती हैं।

जिस घर में बेटी नहीं उनके लिए बेहत फलदायी है तुसली विवाह

तुलसी विवाह के लिए कार्तिक शुक्लपक्ष की एकादशी का दिन शुभ है| इस दिन भगवान शालिग्राम के साथ तुलसी जी का विवाह उत्सव मनाया जाता है| जिस घर में बेटियां नहीं हैं| वे दंपत्ति तुलसी विवाह करके कन्यादान का पुण्य प्राप्त कर सकते हैं| विवाह आयोजन बिल्कुल वैसा ही होता है, जैसे हिन्दू रीति-रिवाज से सामान्य वर-वधु का विवाह किया जाता है|

तुलसी का औषधीय एवं पौराणिक महत्व

तुलसी स्वास्थ्य के दृष्टि से बड़े ही काम की चीज हैं| चाय में तुलसी की दो पत्तियां चाय का जायका बढ़ा ही देती हैं साथ ही शरीर को ऊर्जावान और बिमारियों से दूर रखने में भी सहायता करती हैं| इन्हीं गुणों के कारण आर्युवेदिक दवाओं में तुलसी का उपयोग किया जाता है| तुलसी का केवल स्वास्थ्य के लिहाज से नहीं बल्कि धार्मिक रुप से भी बहुत महत्व है| एक और तुलसी जहां भगवान विष्णु की प्रिया हैं तो वहीं भगवान श्री गणेश से उनका छत्तीस का आंकड़ा है| श्री गणेश की पूजा में किसी भी रूप में तुसली का उपयोग वर्जित है|

देवउठनी एकादशी पर जग जाएंगे भगवान श्रीविष्णु

देवउठनी एकादशी, एकादशी, तुसली विवाह, कार्तिक एकादशीकार्तिक मास में आने वाली शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवोत्थान, देवउठनी या प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है। यह एकादशी दीपावली के बाद आती है। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयन करते हैं और कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन उठते हैं, इसीलिए इसे देवोत्थान एकादशी कहा जाता है।इस दिन से विवाह, गृह प्रवेश तथा अन्य सभी प्रकार के मांगलिक कार्य आरंभ हो जाते हैं। एक पौराणिक कथा में उल्लेख मिलता है कि भगवान श्रीविष्णु ने भाद्रपद मास की शुक्ल एकादशी को महापराक्रमी शंखासुर नामक राक्षस को लम्बे युद्ध के बाद समाप्त किया था और थकावट दूर करने के लिए क्षीरसागर में जाकर सो गए थे और चार मास पश्चात फिर जब वे उठे तो वह दिन देवोत्थनी एकादशी कहलाया। इस दिन भगवान विष्णु का सपत्नीक आह्वान कर विधि विधान से पूजन करना चाहिए। इस दिन उपवास करने का विशेष महत्व है।

देव उठनी एकादशी का महत्व

भगवान विष्णु के शयनकाल के चार मास में विवाह आदि मांगलिक कार्य नहीं किये जाते हैं, इसीलिए देवोत्थान एकादशी पर भगवान हरि के जागने के बाद शुभ तथा मांगलिक कार्य शुरू होते हैं। इस दिन तुलसी विवाह का आयोजन भी किया जाता है।


देवोत्थान एकादशी व्रत और पूजा विधि

प्रबोधिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु का पूजन और उनसे जागने का आह्वान किया जाता है। इस दिन होने वाले धार्मिक कर्म इस प्रकार हैं-

● इस दिन प्रातःकाल उठकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए और भगवान विष्णु का ध्यान करना चाहिए।
● घर की सफाई के बाद स्नान आदि से निवृत्त होकर आंगन में भगवान विष्णु के चरणों की आकृति बनाना चाहिए।
● एक ओखली में गेरू से चित्र बनाकर फल,मिठाई,बेर,सिंघाड़े,ऋतुफल और गन्ना उस स्थान पर रखकर उसे डलिया से ढांक देना चाहिए।
● इस दिन रात्रि में घरों के बाहर और पूजा स्थल पर दीये जलाना चाहिए।
● रात्रि के समय परिवार के सभी सदस्य को भगवान विष्णु समेत सभी देवी-देवताओं का पूजन करना चाहिए।
● इसके बाद भगवान को शंख, घंटा-घड़ियाल आदि बजाकर उठाना चाहिए और ये वाक्य दोहराना चाहिए- उठो देवा, बैठा देवा, आंगुरिया चटकाओ देवा, नई सूत, नई कपास, देव उठाये कार्तिक मास

तुलसी विवाह का आयोजन

Image result for तुसली विवाह, तुसली देवउठनी एकादशीदेवउठनी एकादशी के दिन तुलसी विवाह का आयोजन भी किया जाता है। तुलसी के वृक्ष और शालिग्राम की यह शादी सामान्य विवाह की तरह पूरे धूमधाम से की जाती है। चूंकि तुलसी को विष्णु प्रिया भी कहते हैं इसलिए देवता जब जागते हैं, तो सबसे पहली प्रार्थना हरिवल्लभा तुलसी की ही सुनते हैं। तुलसी विवाह का सीधा अर्थ है, तुलसी के माध्यम से भगवान का आह्वान करना। शास्त्रों में कहा गया है कि जिन दंपत्तियों के कन्या नहीं होती, वे जीवन में एक बार तुलसी का विवाह करके कन्यादान का पुण्य अवश्य प्राप्त करें।

भगवान श्रीविष्णु को तुलसी अर्पित करें

पुराणों में उल्लेख मिलता है कि स्वर्ग में भगवान श्रीविष्णु के साथ लक्ष्मीजी का जो महत्व है वही धरती पर तुलसी का है। इसी के चलते भगवान को जो व्यक्ति तुलसी अर्पित करता है उससे वह अति प्रसन्न होते हैं। बद्रीनाथ धाम में तो यात्रा मौसम के दौरान श्रद्धालुओं द्वारा तुलसी की करीब दस हजार मालाएं रोज चढ़ाई जाती हैं। इस दिन श्रद्धालुओं को चाहिए कि जिस गमले में तुलसी का पौधा लगा है उसे गेरु आदि से सजाकर उसके चारों ओर मंडप बनाकर उसके ऊपर सुहाग की प्रतीक चुनरी को ओढ़ा दें। इसके अलावा गमले को भी साड़ी में लपेट दें और उसका श्रृंगार करें। इसके बाद सिद्धिविनायक श्रीगणेश सहित सभी देवी−देवताओं और श्री शालिग्रामजी का विधिवत पूजन करें। एक नारियल दक्षिणा के साथ टीका के रूप में रखें और भगवान शालिग्राम की मूर्ति का सिंहासन हाथ में लेकर तुलसीजी की सात परिक्रमा कराएं। इसके बाद आरती करें।

Sunday, October 27, 2019

छठ माई की पूजा छठ पूजा (Chhath Puja) 2019



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छठ पूजा
नवरात्र, दूर्गा पूजा की तरह छठ पूजा भी हिंदूओं का प्रमुख त्यौहार है। क्षेत्रीय स्तर पर बिहार में इस पर्व को लेकर एक अलग ही उत्साह देखने को मिलता है। छठ पूजा मुख्य रूप से सूर्यदेव की उपासना का पर्व है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार छठ को सूर्य देवता की बहन हैं। मान्यता है कि छठ पर्व में सूर्योपासना करने से छठ माई प्रसन्न होती हैं और घर परिवार में सुख शांति व धन धान्य से संपन्न करती हैं।

कब मनाया जाता है छठ पूजा का पर्व

सूर्य देव की आराधना का यह पर्व साल में दो बार मनाया जाता है। चैत्र शुक्ल षष्ठी व कार्तिक शुक्ल षष्ठी इन दो तिथियों को यह पर्व मनाया जाता है। हालांकि कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाये जाने वाला छठ पर्व मुख्य माना जाता है। कार्तिक छठ पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व को छठ पूजा, डाला छठ, छठी माई, छठ, छठ माई पूजा, सूर्य षष्ठी पूजा आदि कई नामों से जाना जाता है।

क्यों करते हैं छठ पूजा

छठ पूजा करने या उपवास रखने के सबके अपने अपने कारण होते हैं लेकिन मुख्य रूप से छठ पूजा सूर्य देव की उपासना कर उनकी कृपा पाने के लिये की जाती है। सूर्य देव की कृपा से सेहत अच्छी रहती है। सूर्य देव की कृपा से घर में धन धान्य के भंडार भरे रहते हैं। छठ माई संतान प्रदान करती हैं। सूर्य सी श्रेष्ठ संतान के लिये भी यह उपवास रखा जाता है। अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिये भी इस व्रत को रखा जाता है।

कौन हैं देवी षष्ठी और कैसे हुई उत्पत्ति

छठ देवी को सूर्य देव की बहन बताया जाता है। लेकिन छठ व्रत कथा के अनुसार छठ देवी ईश्वर की पुत्री देवसेना बताई गई हैं। देवसेना अपने परिचय में कहती हैं कि वह प्रकृति की मूल प्रवृति के छठवें अंश से उत्पन्न हुई हैं यही कारण है कि मुझे षष्ठी कहा जाता है। देवी कहती हैं यदि आप संतान प्राप्ति की कामना करते हैं तो मेरी विधिवत पूजा करें। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को करने का विधान बताया गया है।

छठ पूजा, Chhath Puja 2019, छठ पूजा 2019पौराणिक ग्रंथों में इस रामायण काल में भगवान श्री राम के अयोध्या आने के पश्चात माता सीता के साथ मिलकर कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्योपासना करने से भी जोड़ा जाता है, महाभारत काल में कुंती द्वारा विवाह से पूर्व सूर्योपासना से पुत्र की प्राप्ति से भी इसे जोड़ा जाता है।

सूर्यदेव के अनुष्ठान से उत्पन्न कर्ण जिन्हें अविवाहित कुंती ने जन्म देने के बाद नदी में प्रवाहित कर दिया था वह भी सूर्यदेव के उपासक थे। वे घंटों जल में रहकर सूर्य की पूजा करते। मान्यता है कि कर्ण पर सूर्य की असीम कृपा हमेशा बनी रही। इसी कारण लोग सूर्यदेव की कृपा पाने के लिये भी कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्योपासना करते हैं।

छठ पूजा के चार दिन

छठ पूजा का पर्व चार दिनों तक चलता है –
छठ पूजा का पहला दिन नहाय खाय – छठ पूजा का त्यौहार भले ही कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाया जाता है लेकिन इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को नहाय खाय के साथ होती है। मान्यता है कि इस दिन व्रती स्नान आदि कर नये वस्त्र धारण करते हैं और शाकाहारी भोजन लेते हैं। व्रती के भोजन करने के पश्चात ही घर के बाकि सदस्य भोजन करते हैं।
छठ पूजा का दूसरा दिन खरना – कार्तिक शुक्ल पंचमी को पूरे दिन व्रत रखा जाता है व शाम को व्रती भोजन ग्रहण करते हैं। इसे खरना कहा जाता है। इस दिन अन्न व जल ग्रहण किये बिना उपवास किया जाता है। शाम को चाव व गुड़ से खीर बनाकर खाया जाता है। नमक व चीनी का इस्तेमाल नहीं किया जाता। चावल का पिठ्ठा व घी लगी रोटी भी खाई प्रसाद के रूप में वितरीत की जाती है।

षष्ठी के दिन छठ पूजा का प्रसाद बनाया जाता है। इसमें ठेकुआ विशेष होता है। कुछ स्थानों पर इसे टिकरी भी कहा जाता है। चावल के लड्डू भी बनाये जाते हैं। प्रसाद व फल लेकर बांस की टोकरी में सजाये जाते हैं। टोकरी की पूजा कर सभी व्रती सूर्य को अर्घ्य देने के लिये तालाब, नदी या घाट आदि पर जाते हैं। स्नान कर डूबते सूर्य की आराधना की जाती है। 


अगले दिन यानि सप्तमी को सुबह सूर्योदय के समय भी सूर्यास्त वाली उपासना की प्रक्रिया को दोहराया जाता है। विधिवत पूजा कर प्रसाद बांटा कर छठ पूजा संपन्न की जाती है।
छठ पूजा पर्व तिथि व मुहूर्त 2019

छठ पूजा 2019

2 नवंबर 2019

छठ पूजा के दिन सूर्योदय – 06:33

छठ पूजा के दिन सूर्यास्त – 17:35

षष्ठी तिथि आरंभ – 00:51 (2 नवंबर 2019)

षष्ठी तिथि समाप्त – 01:31 (3 नवंबर 2019)

Govardhan Puja or Annakoot 2019: आज है गोवर्द्धन पूजा,

गोवर्धन पूजा पर्व को अन्नकूट पर्व के नाम से भी जाना जाता है। दीपावली के अगले दिन मनाये जाने वाले इस त्योहार की विशेष छटा ब्रज में देखने को मिलती है। गोवर्धन पूजा में गोधन यानी गायों की पूजा की जाती है। देवी लक्ष्मी जिस प्रकार सुख समृद्धि प्रदान करती हैं उसी प्रकार गौ माता भी अपने दूध से स्वास्थ्य रूपी धन प्रदान करती हैं। मान्यता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को मूसलधार वर्षा से बचने के लिए सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी उंगली पर उठाकर रखा था तो गोप-गोपिकाएं उसकी छाया में सुखपूर्वक रहे। सातवें दिन भगवान ने गोवर्धन पर्वत को नीचे रखा और हर वर्ष गोवर्धन पूजा करके अन्नकूट उत्सव मनाने की आज्ञा दी। तभी से यह पर्व अन्नकूट के नाम से मनाया जाने लगा.

गोवर्द्धन पूजा या अन्‍नकूट कब है
गोवर्धन पूजा कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाई जाती है. अन्नकूट (Anna Koot) पूजा दीवाली (Diwali) के एक दिन बाद यानी ठीक दीवाली के अगले दिन मनाई जाती है. इस बार अन्नकूट पूजा 28 अक्‍टूबर को है.

अन्नकूट क्‍या है?
अन्नकूट पर्व पर तरह-तरह के पकवानों से भगवान की पूजा का विधान है. अन्नकूट यानी कि अन्न का समूह. श्रद्धालु तरह-तरह की मिठाइयों और पकवानों से भगवान कृष्‍ण को भोग लगाते हैं. मान्यताओं के मुताबिक भगवान श्रीकृष्ण के अवतार के बाद द्वापर युग से अन्नकूट और गोवर्धन पूजा की शुरुआत हुई. एक और मान्यता है कि एक बार इंद्र अभिमान में चूर हो गए और सात दिन तक लगातार बारिश करने लगे. तब भगवान श्री कृष्ण ने उनके अहंकार को तोड़ने और जनता की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को ही अंगुली पर उठा लिया था. बाद में इंद्र को क्षमायाचना करनी पड़ी थी. कहा जाता है कि उस दिन के बाद से गोवर्धन की पूजा शुरू हुई. जमीन पर गोबर से गोवर्धन की आकृति बनाकर पूजा की जाती है.
भगवान को लगते हैं तरह-तरह के व्यंजनों के भोग

कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाये जाने वाले इस पर्व के दिन बलि पूजा, मार्गपाली आदि उत्सवों को भी मनाने की परम्परा है। इस दिन भगवान को तरह−तरह के व्यंजनों के भोग लगाये जाते हैं और उनके प्रसाद का लंगर लगाया जाता है। इस दिन गाय−बैल आदि पशुओं को स्नान करा कर फूलमाला, धूप, चंदन आदि से उनका पूजन किया जाता है। गायों को मिठाई खिलाकर उनकी आरती उतारी जाती है तथा प्रदक्षिणा की जाती है। गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर जल, मौली, रोली चावल लगाकर पूजा करते हैं तथा परिक्रमा करते हैं। मान्यता है कि इस दिन गाय की पूजा करने से सभी पाप उतर जाते हैं और मोक्ष प्राप्त होता है।

पर्व से जुड़ी कथा

एक बार भगवान श्रीकृष्ण गोप−गोपियों के साथ गायें चराते हुए गोवर्धन पर्वत की तराई में पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि हजारों गोपियां गोवर्धन पर्वत के पास छप्पन प्रकार के भोजन रखकर बड़े उत्साह से नाच गाकर उत्सव मना रही हैं। श्रीकृष्ण के पूछने पर गोपियों ने बताया कि मेघों के स्वामी इन्द्र को प्रसन्न रखने के लिए प्रतिवर्ष यह उत्सव होता है। श्रीकृष्ण बोले− यदि देवता प्रत्यक्ष आकर भोग लगाएं, तब तो इस उत्सव की कुछ कीमत है। गोपियां बोलीं− तुम्हें इन्द्र की निन्दा नहीं करनी चाहिए। इन्द्र की कृपा से ही वर्षा होती है।

श्रीकृष्ण बोले− वर्षा तो गोवर्धन पर्वत के कारण होती है, हमें इन्द्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए। सभी गोप−ग्वाल अपने−अपने घरों से पकवान ला−लाकर श्रीकृष्ण की बताई विधि से गोवर्धन की पूजा करने लगे। इन्द्र को जब पता चला कि इस वर्ष मेरी पूजा न होकर गोवर्धन की पूजा की जा रही है तो वह कुपित हुए और मेघों को आज्ञा दी कि गोकुल में जाकर इतना पानी बरसायें कि वहां पर प्रलय का दृश्य उत्पन्न हो जाये।

मेघ इन्द्र की आज्ञा से मूसलाधार वर्षा करने लगे। श्रीकृष्ण ने सब गोप−गोपियों को आदेश दिया कि सब अपने−अपने गायों बछड़ों को लेकर गोवर्धन पर्वत की तराई में पहुंच जाएं। गोवर्धन ही मेघों की रक्षा करेंगे। सब गोप−गोपियां अपने−अपने गाय−बछड़ों, बैलों को लेकर गोवर्धन पर्वत की तराई में पहुंच गये। श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठ उंगली पर धारण कर छाता सा तान दिया। सब ब्रजवासी सात दिन तक गोवर्धन पर्वत की शरण में रहे। सुदर्शन चक्र के प्रभाव से ब्रजवासियों पर जल की एक बूंद भी नहीं गिरी।

ब्रह्माजी ने इन्द्र को बताया कि पृथ्वी पर श्रीकृष्ण ने जन्म ले लिया है। उनसे तुम्हारा बैर लेना उचित नहीं है। श्रीकृष्ण अवतार की बात जानकर इन्द्रदेव लज्जित हुए तथा भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा−याचना करने लगे। श्रीकृष्ण ने सातवें दिन गोवर्धन पर्वत को नीचे रखकर ब्रजवासियों से कहा कि अब तुम प्रतिवर्ष गोवर्धन पूजा कर अन्नकूट का पर्व मनाया करो। तभी यह यह गोवर्धन पर्व के रूप में प्रचलित हो गया।

Saturday, October 26, 2019

मां लक्ष्‍मी की आरती


ॐ जय लक्ष्मी माता,
ॐ जय लक्ष्मी माता,
मैया जय लक्ष्मी माता ।
तुमको निसदिन सेवत,
हर विष्णु विधाता ॥
उमा, रमा, ब्रम्हाणी,
तुम ही जग माता ।
सूर्य चद्रंमा ध्यावत,
नारद ऋषि गाता ॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता...॥
दुर्गा रूप निरंजनि,
सुख-संपत्ति दाता ।
जो कोई तुमको ध्याता,
ऋद्धि-सिद्धि धन पाता ॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता...॥
तुम ही पाताल निवासनी,
तुम ही शुभदाता ।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशनी,
भव निधि की त्राता ॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता...॥
जिस घर तुम रहती हो,
ताँहि में हैं सद्‍गुण आता ।
सब सभंव हो जाता,
मन नहीं घबराता ॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता...॥
तुम बिन यज्ञ ना होता,
वस्त्र न कोई पाता ।
खान पान का वैभव,
सब तुमसे आता ॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता...॥
शुभ गुण मंदिर सुंदर,
क्षीरोदधि जाता ।
रत्न चतुर्दश तुम बिन,
कोई नहीं पाता ॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता...॥
महालक्ष्मी जी की आरती,
जो कोई नर गाता ।
उँर आंनद समाता,
पाप उतर जाता ॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता...॥

टिप्पणियां ॐ जय लक्ष्मी माता,
मैया जय लक्ष्मी माता ।
तुमको निसदिन सेवत,
हर विष्णु विधाता ॥

कार्तिक मास 2021

  हिंदू धर्म में हर महीने का अलग-अलग महत्व होता है। लेकिन कार्तिक मास की महिमा बेहद खास मानी जाती है। हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास आठ...