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Friday, December 13, 2019

शाह जहाँ को मलूकदास जी का श्राप देना

शाह जहाँ के शाशन काल में धर्मान्तरण की प्रक्रिया जोरों पर थी. एक दिन शाह जहाँ ने मंत्रियों को बुला कर पूछा. ये बताओ इतना बल और छल प्रयोग करने के बाद भी मुल्क का इस्लामीकरण क्यों नहीं हो पा रहा ? मंत्री बोले तुमसे ना हो पायेगा. जब तक हिन्दू साधु संत जमात के साथ विचरण करते रहेंगे, सत्संग करते रहेंगे तब तक ना हो पायेगा. सुनते ही शाह जहाँ ने फतवा जारी कर दिया. कहा जो भी साधू संत जमात के साथ घुमते मिल जाए . कैद कर के जेल में डाल दो. पूरे भारत में हजारों साधु संत बंदी बना लिए गए.

उसी समय मलूक दास जी महाराज प्रयाग के निकट कड़ा में विराजमान थे. वनखंडी नारायण दास जी महाराज उनके पास आये. मलूक दस जी से आग्रह किया हजारों निरपराध संत बंदी है और आप तपस्या में बैठे हैं. आप जैसे सिद्ध संत कृपा नहीं करेंगे तो कौन करेगा? मलूक दास जी ने संतो के उद्धार का निश्चय किया. फतवा की ऐसी तैसी करते हुए प्रयागराज से आप दक्षिण के श्री काकुलम पहुचे. वहां संतो को बंदीगृह से मुक्त करवाया. वहां के रजा को वैष्णवी दीक्षा दी.

फिर मलूक दास जी दिल्ली आये जैसे ही मलूक दस जी दिल्ली पहुचे पूरी जमात सहित आपको बंदी बना लिया गया. सबको काराग्रह में भेज दिया गया. आप समर्थ संत थे. जैसे ही आपको काराग्रह में भेजा गया सभी संतो की बेड़ियाँ अपने आप टूट गयीं काराग्रह के ताले खुल गए. आप पूरे संत समाज के साथ मथुरा में यमुना नदी के किनारे विराजमान हो गए.
जैसे ही आप दिल्ली की सीमा से बहार आये शाह जहाँ का पूरा शरीर जलने लगा. ऐसी तैसी हो गयी नवाब की. सारे हकीम वैद्य फेल हो गए. उसी समय मलूक दास जी के जाने की सूचना मिली. शाह जहाँ सब समझ गया. तब पूछते पूछते वो मलूक दस जी के पास पंहुचा.
जैसे ही शाह जहाँ मलूक दास जी के पास पंहुचा. रोने अलग माफ़ी मांगने लगा. बोला पूरा शरीर जला जा रहा है माफ़ कर दो. मलूक दास जी ने कहा तुमने संतो को बहुत कष्ट पहुचाया है. इसलिए तुम्हारा बेटा तुम्हे भी कारागार में डालेगा और वही तुम्हारी मृत्य होगी. शाह जहाँ ने कहा बस ये जलन ठीक करो. नहीं तो हम बेटे के जेल में डालने तक बचेंगे ही नहीं.
मलूक दस जी की शर्ते

मलूक दास जी ने शाह जहाँ के सामने कुछ शर्ते रखीं.

बलपूर्वक किसी का धर्मांतरण ना कराया जाए.

गौ हत्या तत्काल बंद हो.

साधू संतो के कहीं भी आने जाने पर किसी भी प्रकार की कोई भी पाबंदी ना हो.

मरता क्या ना करता शाह जहाँ ने सब मान लिया. मलूक दस जी ने कृपा की और उसकी पीड़ा का अंत हो गया.
शाह जहाँ ने मलूक दास जी को सम्मानित किया.

मलूक दास जी को फ़कीर-ऐ-शहंशाह का खिताब दिया. साथ में 500 गावों की जागीर दी. जिससे मलूक दास की परंपरा का खूब विस्तार हुआ. आज भी मलूक पीठ श्री धाम वृन्दावन में है.

समय बीता और मलूक दास जी की वाणी सत्य हुई. औरंगजेब ने शाह जहाँ को आगरा के किले में कैद कर दिया और वही उसकी मृत्यु हो गयी.

गुरु नानक देव जी और लालची आदमी

गुरु नानक देव जी अपने शिष्यों के साथ यात्रा किया करते थे. एक बार गांव के तरफ से गुजरते हुए उन्हें अचानक प्यास लगी. चलते-चलते उनको पहाड़ी पर एक कुआं दिखाई दिया. गुरु नानक ने शिष्य को पानी लेने के लिए भेजा. लेकिन कुएं का मालिक लालची और धनी था. वो पानी के बदले धन लिया करता था. शिष्य उस लालची आदमी के पास तीन बार पानी मांगने गया और तीनों बार उसे भगा दिया गया क्योंकि उसके पास धन नहीं था. भीषण गर्मी में गुरु नानक और शिष्य अभी तक प्यासे थे. गुरु जी ने कहा- 'ईश्वर हमारी मदद जरूर करेगा.'



इसके बाद नानक जी ने मिट्टी खोदना शुरू कर दिया. थोड़ा ही खोदा था और अचानक वहां से शुद्ध पानी आने लगा. जिसके बाद गुरु जी और शिष्यों ने पानी पीकर प्यास बुझाई. गांव वाले भी देखकर वहां पानी पीने पहुंच गए. यह देखकर कुएं के मालिक को गुस्‍सा आ गया. उसने कुएं की तरफ देखा तो वो हैरान रह गया. एक तरफ पानी की धारा बह रही थी तो दूसरी तरफ कुएं का पानी कम होता जा रहा था. फिर कुएं के मालिक ने गुरु जी को जोर से पत्थर मारा. लेकिन गुरु जी ने हाथ आगे किया और पत्थर हाथ से टकराकर वहीं रुक गया. ऐसा देख कुएं का मालिक उनके चरणों पर आकर गिर गया. गुरु जी ने समझाया- "किस बात का घमंड? तुम्हारा कुछ नहीं है. खाली हाथ आए थे खाली हाथ जाओगे. कुछ करके जाओगे तो लोगों के दिलों में हमेशा जिंदा रहोगे."
गुरु नानक जी के आशीर्वाद का रहस्य गुरु नानक देव जी अपने शिष्यों के साथ एक गांव पहुंचे. उस गांव के लोग बहुत ही बुरे थे. वो हर किसी के साथ दुर्व्यवहार किया करते थे. जैसे ही गुरु नानक पहुंचे तो गांव के लोगों ने उनके साथ बहुत दुर्व्यवहार किया और उनकी हंसी उड़ाने लगे. गुरु जी ने गांव वालों को दुर्व्यवहार ना करने के लिए समझाने की कोशिश की. लेकिन उन पर कोई असर नहीं हुआ. गुरु जी वहां से निकलने लगे. गांव वालों ने कहा- महात्मन, हमने आपकी इतनी सेवा की. जाने से पहले कम से कम आशीर्वाद तो देते जाईये. उन्हें आशीर्वाद देते हुए गुरु जी ने कहा- 'एक साथ एक जगह पर रहो.'

कुएं बाद गुरुजी दूसरे गांव पहुंचे. उस गांव के लोग बहुत ही अच्छे थे. गांव के लोगों ने गुरु जी की खूब सेवा की और भरपूर अतिथि-सत्कार किया. जब गुरु जी के गांव छोड़ने का वक्त आया तो गांव वालों ने भी आशीर्वाद मांगा. उन्हें आशीर्वाद देते हुए गुरु जी ने कहा- "तुम सब उजड़ जाओ." इतना सुनकर उनके शिष्य हैरान रह गए. उन्होंने पूछा- "गुरु जी आज हम दो गावों में गए. दोनों जगह आपने अलग अलग आशीर्वाद दिए.लेकिन ये आशीर्वाद हमारे समझ में नहीं आए." जिसके बाद गुरु जी ने कहा- "एक बात हमेशा ध्यान रखो – सज्जन व्यक्ति जहां भी जाता है, वो अपने साथ सज्जनता और अच्छाई लेकर जाता है. वो जहां भी रहेगा, अपने चारों ओर प्रेम और सद्भाव का वातावरण बना कर रखेगा. अतः मैंने सज्जन लोगों से भरे गांव के लोगों को उजड़ जाने को कहा."

Wednesday, November 27, 2019

संतो की दया

एक बार एक अंधा व्यक्ति जो की परमात्मा का भक्त था, डेरे आया । तो उसने एक सेवादार वीर से कहा के वीर जी मैं आपके महाराज जी से बात करना चाहता हु आप बता सकते है की मैं उनसे कैसे मिल सकता हूँ ?
तो उस सेवादार वीर ने कहा कि कुल मालिक इस वक्त सतंसग फरमा रहे है। सो मैं आप को पंडाल मे छोड आता हुं। और संगत भी ज्यादा है। मुलाकात नहीं हो सकती। और उस सेवादार वीर ने उस अधें व्यक्ति को पंडाल में सबसे पिछे एक साईड पर बैठा दिया।
उसने बडे प्यार से सतंसग सुना पहले ही सतंसग ने उसके अंदर ऐसी हलचल पैदा कर दी की वो नाम दान के बारे में सोचने लगा। उसी वक्त वो सेवादार वीर उसके पास आया और पूछने लगा सतसगं आपको कैसा लगा तो उस व्यक्ति ने फिर कहा कि मुझे अपने मुर्शिद से जरुर मिलवाओ। तो उस सेवादार वीर ने कहा वीर तु कल का सतसगं फिर सुन और रात को मेरे पास ही रहना।
दुसरे दिन भी उस सेवादार वीर ने उसे सतसगं पडांल मे बिठा दिया । दुसरे दिन भी महाराज जी ने नाम दान के
बारे में ही समझाया , उस व्यक्ति की आखों से ट्प-ट्प आसुं बह रहे थे। उसको गुरु के प्रति बहुत बैराग आया और जारो-जार रोए जा रहा था और अदंर से फरियाद की मालिक क्या तुं मेरे भी गुनाह बक्श देगा।
दुसरे दिन सतसगं समाप्ति पर वही सेवादार वीर आया और उसको साथ ले गया, उस अंधें व्यक्ति ने उस सेवादार वीर से फरियाद की , कि मुझे भी नाम दान दिलवा दो। और क्या मुझे भी नाम दान मिल सकता हैं । तो उस सेवादार ने कहा कि हुक्म तो नहीं है की किसी अधें व्यक्ति को नाम दान मिले पर आपकी तड्प देख करआपको साथ ले चलता हू, उस वक्त छांटी भी इतनी सख्त नहीं थी, लाइन में कही पर रुकावट आती तो गुरु के प्रति उसकी तड्प को देख कर उसे आगे भेज देते ओर उसकी तड्प और बैराग ने वो सब दिवारे तोड दी जो उसके मिलाप के रास्ते की रुकावट बन रही थी।
आखिर जब सच्चे पातशाह कुल मालिक जी के सामने पेश किया तो सतगुरु जी ने फरमाया कि "तेरी आंखो की जोत नहीं है इसलिए तुम्हे नाम-दान नहीं मिल सकता " वो व्यक्ति इतना सुनते ही वैराग में आकर कहता है की:- अच्छा फिर आप मुझे उस जगह पर भेज दिजीए जहा नाम दान मिल सकता हो।उसकी तड्प को देखते हुए जानी-जान सतगुरु जी ने उसे नाम दान वाली तरफ बिठा दिया ओर कहा कि इसको सब से पिछे बिठा दो।इसी तरह ही किया गया ।
जब सब को नाम दान की बक्शिश हो चुकी तो सतगुरु जी खुद चल कर उसके पास आए ओर कहां की भाई खडा हो जब खडा हुआ तो बोले कि "तक चंगी तरा मेरे वाल्ल"(मेरी तरफ गोर से देखो) क्योकी एह सरुप तेरे काम आवेगा जब उसने उपर देखा तो उसकी आखों की जोत आ गइ थी। तो उसने सच्चे पातशाह जी के दर्शन किए।तो कुल मालीक जी ने उसको नाम दान की बक्शीश कर दी। उसका भरोसा पक चुका था की जो थोडी देर के लिए बाहरी जोत बक्श सकता हैं वो अंदर की जोत के दर्शन करवा सकता हैं । सो उसने बडे ड्ट कर सतगुरु जी के उपदेश का पालन करते हुए भजन सिमरन किया ओर मालिक की मौज से उसका परदा खुल गया। उसको अपने पिछले जन्म की सारी कहानी का पता चल गया।
कुछ समय बाद वो डेरे आया।महाराज जी सत्सगं फरमा रहे थे वो बिच मे उठ कर कहता है की हजुर अर्ज करनी है, तो महाराज जी ने फरमाया कि बैठ जाओ कोई बात नहीं तुम बैठ जाओ वो व्यक्ति फिर खडा हो गया कि हजुर रहा नहीं जाता आप आज्ञा दिजीए. तो महाराज जी ने कहा " चंगा चला ले जेडी बंदुक चलानी है "
ओ दुनिया वालो तुम गलतफहमी में मत रहना एह ता पुरा गुरु है। और पूर्ण परमात्मा है मै आपको अपनी पिछले जन्म की कहानी सुनाता हुं :-
मैं पिछले जन्म में गिद्द था और डेरे के रास्ते में एक बबुल के पेड पर मेरा ठिकाना था एक बार कुछ सत्संगी डेरे से लाया हुआ लंगर का प्रशाद उसी पेड के निचे बैठ कर खा रहे थे उनके हाथ से जो प्रशाद नीचे गिर गया उनके जाने के बाद मैने वो गिरा हुआ प्रशाद खा लिया इसलिए मुझे मनुष्य का जन्म मिला ओर मैं अधां क्यू हूआ एक कुत्ते का पिल्ला ट्रक की साइड लगने से अधमरी अवस्था में पडा था और तड्फ रहा था। मैं गिद्द जात मुझे मॉस के सिवा कोई चीज अच्छी नही लगती थी में उस पिल्ले के पास गया ओर उसकी आखें निकाल कर खा गया इसी कारण मुझे प्रशाद खाने से मनुष जन्म तो मिल गया पर पिल्ले की आखें खाने के कारण मैं इस जन्म में अधां हूं
सो भाईयो मुझे ये सारी सोझी पुरे गुरु द्वारा ही मिली है। आप भी इन्हे आम इन्सान समझने की गलती मत करना...

Friday, November 22, 2019

मलूकदास और डकैत







मलूकदास नाम के एक सेठ थे। उनका जन्म इलाहाबाद जिले के कड़ा नामक ग्राम में वैशाख वदी पंचमी, संवत् 1631 को लाला सुन्दर दास खत्री कक्कड़ के घर हुआ था। पूर्व के पुण्य से वे बाल्यावस्था में तो अच्छे रास्ते चले और भक्ति भाव का आश्रय लिया लेकिन जवानी में जरा भटक गये।


उनके बँगले के नजदीक ही एक मंदिर था। एक रात्रि को पुजारी के कीर्तन की ध्वनि के कारण उन्हें ठीक से नींद नहीं आयी। सुबह उन्होंने पुजारी को खूब डाँटा कि ‘‘यह सब क्या?’’

पुजारी बोले : ‘‘एकादशी का जागरण-कीर्तन चल रहा था।’’

‘‘अरे! क्या जागरण-कीर्तन करते हो? हमारी नींद हराम कर दी। अच्छी नींद के बाद व्यक्ति काम करने के लिए तैयार हो पाता है, फिर कमाता है तब खाता है।’’

पुजारी ने कहा : सेठजी! खिलाता तो वह खिलाने वाला ही है।’’

‘‘कौन खिलाता है? क्या तुम्हारा भगवान खिलाने आयेगा?’’
‘‘वही तो खिलाता है।’’
‘‘क्या भगवान खिलाता है? हम कमाते हैं तब खाते हैं।’’

‘‘निमित्त होता है तुम्हारा कमाना और पत्नी का रोटी बनाना। बाकी सबको खिलानेवाला, सब का पालनहार तो वह जगन्नियंता ही है।’’

‘‘क्या पालनहार-पालनहार लगा रखा है?
बाबा आदम के जमाने की बातें करते हो। क्या तुम्हारा पालने वाला एक-एक को आकर खिलाता है? आखिर हम कमाते है तभी खाते है’’

‘‘सभी को वही खिलाता है।’’
‘‘हम नहीं खाते उसका दिया।’’
‘‘पुजारी! अगर तुम्हारा भगवान मुझे चौबीस घंटो में नहीं खिला पाया तो फिर तुम्हें अपना यह भजन-कीर्तन सदा के लिए बंद करना होगा, नहीं तो मैं तुम्हारा सिर उड़ा दूँगा।’’

‘‘सेठजी! मैं जानता हूँ कि तुम्हारी बहुत पहुँच है लेकिन उसके हाथ लंबे है। जब तक वह नहीं चाहता, तब तक किसी का बाल भी बाँका नहीं हो सकता।’’

ठीक है, आजमाकर देख लेना।’’
पुजारी कोर्इ सात्त्विक, भगवान में प्रीतिवाले भक्त रहे होंगे।


मलूकदास किसी घोर जंगल में चले गये और विशालकाय वृक्ष की ऊँची डाल पर चढ़ कर बैठ गये कि ‘अब देखें इधर कौन खिलाने आता है? चौबीस घंटे बीत जायेंगे और पुजारी की हार हो जायेगी। सदा के लिए कीर्तिन की झंझट मिट जायेगी।’

दो-तीन घंटे के बाद अजनबी आदमी वहाँ आया। उसने वृक्ष के नीचे आराम किया। फिर अपना सामान उठाकर चल दिया लेकिन अपना एक थैला वहीं भूल गया।
भूल गया कहो, छोड़ गया कहो। भगवान ने किसी मनुष्य को प्रेरणा की थी अथवा मनुष्य रूप में साक्षात् भगवत्सत्ता ही वहाँ आयी थी, यह तो भगवान ही जानें।

थोड़ी देर बाद पाँच डकैत वहाँ से पसार हुए। उनमें से एक ने अपने सरदार से कहा : उस्ताद! यहाँ कोर्इ थैला पड़ा है।’’

‘‘क्या है? जरा देखो।’’
खोलकर देखा तो उसमें गरमागरम भोजन से भरा टिफिन!
‘‘उस्ताद! भूख लगी है, लगता है यह भोजन भगवान ने ही भेजा है।’’
‘‘अरे! तेरा भगवान यहाँ कैसे भोजन भेजेगा? हमको पकड़ने या फँसाने के लिए किसी शत्रु ने ही जहर-वहर डालकर यह टिफिन यहाँ रखा होगा अथवा पुलिस का कोर्इ “षड्यंत्र होगा। इधर-उधर देखो जरा कौन रखकर गया है?’’

मलूकदास सेठ ऊपर बैठे-बैठे सोचने लगे कि ‘अगर मैं कुछ बोलूँगा तो ये मेरे ही गले पड़ेंगे।’
वे तो चुप रहे लेकिन हृदय की धड़कने चलाता है, भक्त-वत्सल है वह अपने भक्त का वचन पूरा किये बिना शांत कैसे रहता? उसने उन डकैतों को प्रेरित किया कि ‘ऊपर भी देखो।’ उन्होंने ऊपर देखा तो वृक्ष की डाल पर एक आदमी बैठा हुआ दिखा।

डकैत चिल्लाये : अरे! नीचे उतर।’’
‘‘मैं नहीं उतरता।’’
‘‘क्यों नहीं उतरता, यह भोजन तूने ही रखा होगा।’’
‘‘मैंने नहीं रखा। कोर्इ यात्री अभी आया था, वही इसे भूलकर चला गया।’’
‘‘नीचे उतर । तुने ही रखा होगा जहर-वहर मिलाकर और अब बचने के लिए बहाने बना रहा है, तुझे ही यह भोजन खाना पडे़गा।’’

अब कौन-सा काम वह सर्वेश्वर किसके द्वारा किस निमित्त से करवाये अथवा उसके लिए क्या रूप ले यह उसकी मर्जी की बात है । बड़ी गजब की व्यवस्था है उस परमेश्वर की!

मलूकचंद बोले : ‘‘मैं नीचे नहीं उतरूँगा और खाना तो मैं कतर्इ नहीं खाऊँगा।’’
‘‘पक्का तूने खाने में जहर मिलाया है। अरे! नीचे उतर, अब तो तुझे खाना ही होगा।’’

‘‘मैं नहीं खाऊँगा, नीचे भी नहीं उतरूँगा।’’
‘‘ अरे! कैसे नहीं उतरेगा?’’
डकैतों के सरदार ने अपने एक आदमी को हुक्म दिया : ‘‘इसको जबरदस्ती नीचे उतारो।’’ डकैत ने मलूकदास को पकड़कर नीचे उतारा।

‘‘ले, खाना खा।’’
‘‘मैं नहीं खाऊँगा।’’

उस्ताद ने धड़ाक- से उनके मुँह पर तमाचा जड़ दिया। मलूकचंद को पुजारी की बात याद आयी कि ‘ नहीं खाओगे तो मारकर भी खिलायेगा…’

मूलकचंद बोले : ‘‘मैं नहीं खाऊँगा।’’

‘‘अरे! कैसे नहीं खायेगा? इसकी नाक दबाओ और मुँह खोलो।’’

वहाँ कोर्इ लकड़ी की डंडी पड़ी थी। डकैतों ने उससे उसका मुँह खोला और जबरदस्ती एक कौर ठूँस दिया । वे नहीं खा रहे थे तो डकैत उन्हें पीटने लगे।

अब मलूकचंद ने सोचा कि ‘ये पाँच है और मैं अकेला हूँ। नहीं खाऊँगा तो ये मेर हड्डी- पसली एक कर देंगे।’ इसलिए चुपचाप खाने लगे और मन-ही मन कहा ‘मान गये मेरे बाप! मारकर भी खिलाता है। डकैतों के रूप में खिला, चाहे भक्तों के रूप में खिला लेकिन खिलानेवाला तो तू ही है। अपने पुजारी की बात तूने सत्य साबित कर दिखायी।’

मूलकदास के बचपन की भक्ति की धारा फूट पड़ी ।उनको मार-पीटकर डकैत वहाँ से चले गये तो मलूकदास भागे और पुजारी के पास आकर बोले : ‘‘पुजारी जी ! मान गये आपकी बात कि नहीं खायें तो वह मारकर भी खिलाता है।’’

पुजारी बोले : ‘‘वैसे तो तीन दिन तक कोर्इ खाना न खाये तो वह जरूर किसी-न-किसी रूप मे आकर खिलाता है लेकिन मैंने प्रार्थना की थी कि ‘तीन दिन की नहीं एक दिन की शर्त रखी है, तू कृपा करना।’ अगर कोर्इ सच्ची श्रद्धा और विश्वास से हृदयपूर्वक प्रार्थना करता है तो वह अवश्य सुनता है। वह तो सर्वव्यापक, सर्वसमर्थ है। उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं हैं।’’

                                       कर्तु शक्या अकर्तुं शक्यं कर्तु शक्यम्।

कार्तिक मास 2021

  हिंदू धर्म में हर महीने का अलग-अलग महत्व होता है। लेकिन कार्तिक मास की महिमा बेहद खास मानी जाती है। हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास आठ...